Friday, August 27, 2010

कौन झूठा कौन सच्चा

आज जब न्यायपालिका के फैसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता या कहे कि किसी को यह अधिकार ही नहीं है कि वह न्यायालय के फैसलों उपर अगुली उठाये लेकिन रोहित शेखर बनाम पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी के मामले में जिसमें रोहित नारायण दत्त को अपना पिता बता रहा है और वो भी ऐसे समय में जब दोनों आमने सामने है लेकिन रोहित अपने आप को साबित करने के लिये दर-दर भटक रहा है । रोहित की मां उज्ज्वला शर्मा कांग्रेसी नेता है और नारायण दत्त तिवारी के साथ उनकी दोस्ती रही है । रोहित नारायण दत्त तिवारी को अपना पिता बताते रहे है । यह मामला नया नहीं है जब नरायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे उस समय से ही यह मामला उठता रहा है लेकिन एक तरफ राजनेता हैं तो दूसरी तरफ एक युवा जो अपने को यह साबित करने की कोशिश में है उसके पिता कौन हैं। हमारे देश में यह अपने आप में यह पहला मामला है जब एक पुत्र अपने पिता के डीएनए टेस्ट के लिये कोर्ट से गुहार लगा रहा है और कोर्ट से भी उसे कोई न्याय मिलता नहीं दिख रहा । हाई कोर्ट ने एक बार तो रोहित की अर्जी को खारिज़ भी कर दिया था लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है और हो सकता है नारायण दत्त तिवारी को डीएनए टेस्ट कराने पर बाध्य होना ही पड़े । अभी तो अदालत ने 84 वर्षीय तिवारी को 75 हज़ार का जुर्माना लगाया है, जो रकम रोहित को दी जायेगी, सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के साथ 21 सितंबर को फिर तारीख दे दी है, लेकिन यह एक ऐसा मामला है जिसे हल करना बेहद आसान है । रोहित की मांग को किसी भी लिहाज से गलत नहीं करार दिया जा सकता । रोहत का दावा है कि तिवारी रोहित के जैविक पिता है । अगर हक़ीक़त को जनना है तो डीएनए टेस्ट ही एक मात्र विकल्प है जो गलत नहीं हो सकता लिहाजा टेस्ट किया जाना चाहिये था लेकिन एनडी तिवारी का टेस्ट आज तक नहीं हो पाया । अगर तिवारी जी स्वर्गवासी हो जाते है तो फिर यह तय कौन करेगा कि क्या हक़ीक़त थी । 84 साल के नारायण दत्त तिवारी इस पूरे मामले के असली सबूत है लिहाजा डीएनए टेस्ट जल्द हो और यह साफ होना चाहिये कि कौन झूठा कौन सच्चा । डीएनए टेस्ट से इनकार करना नारायण दत्त तिवारी के उपर अंगुलिया ही उठायेगा। बेहतर होता नारायण दत्त तिवारी सच्चाई को स्वीकार करते और जो भी सच है वह सामने आता ।

राजधानी में डेंगू

राजधानी में डेंगू
दिल्ली में यमुना नदी का पानी जितनी तेजी से बढ़ रहा है उससे तेज दिल्ली में रहने वाले लोगों की परेशानिया बढ़ रही है ।
दिल्ली की सड़कों पर 3 घंटे की बारिश में ही पानी जमा हो जाता है और कहीं कहीं तो नाव भी चलने लगी है । पिछले 10 दिन से दिल्ली निवासियों को जल जमाव, वारिश और जाम इन तीन समस्याओं से जूझना पड़ रहा है । दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले तो वारिश की परेशानियों को मानने को तैयार ही नहीं थी लेकिन जब सड़कों पर नाव भी दौड़ने लगी तो शीला ने भी मान ही लिया कहीं न कहीं लापरवाहियां हुई है । इसे ठीक करने की कोशिश की जायेगी । पिछले 12 साल से दिल्ली में शीला सरकार को बारह बारिशों के मौसम से दो चार होना पड़ा होगा और हर बार बारिश में यही दिक्कतें देश की राजधानी के सामने होती है । दिल्ली में जल जमाव से होने वाली दिक्कतें केवल दिल्ली वासियों को ही नहीं बल्कि विदेशी पर्यटक मेहमानों को भी इससे दो चार होना पड़ता है । ऐसा नहीं है कि यह पहली बार है और मुख्यमंत्री अपनी जिम्मेदारियों का ठीकरा दूसरों के उपर फोड़ कर सफाई दे देंगी। हर साल होने वाले जल जमाव से निपटने के कोई प्रबंध नहीं किये गये । इतना ही नहीं दिल्ली में हर साल सैकड़ों लोंग बारिश में जल जमाव से पैदा होने वाले मच्छरों से फैलने वाले डेंगू से मर जाते है जिसका न तो कोई सरकार के पास सही आंकड़ा है न ही सरकार ने कोई उपाय किये जिससे राजधानी दिल्ली में डेंगू से निपटा जा सके । आज भी बारिश से उतना डर लोगों को नहीं है जितना बारिश से जमा होने वाले पानी से फैलने वाले डेंगू से । दिल्ली सरकार का स्वास्थ्य अमला भले ही हर साल करोंड़ों रुपये डेंगू की रोकथाम के नाम पर खर्च कर देता हो लेकिन डेंगू न फैलने के इंतजामों में हमेशा कोताही बरती जाती रही है । न तो पानी के जल जमाव न होने का उचित बंदोबस्त किया गया और न ही नालियों की साफ सफाई पर ही ध्यान दिया जाता रहा, कुल मिलाकर जो समस्या 10 साल पहले थी वह आज भी है और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को लेकर हो रहे निर्माण कार्य के कारण खुदायी से जल जमाव से यह समस्या और बढ़ी ही है । दिल्ली नगर निगम के मेयर पृथ्वीराज साहनी तो बारिश से हो रही समस्या को दिल्ली सरकार के ही सिर फोड़ते हुये इसे समस्या से निपटना भगवान भरोसे बताया है । कुल मिलाकर देश की राजधानी दिल्ली का यह हाल है तो फिर दूर-दराज के इलाकों में विकास का क्या हाल होगा । दिल्ली में डेंगू, जल जमाव और लोगों की परेशानियां दिल्ली ही नहीं केंद्र सरकार की ग्रामीण नीतियों की भी पोल खोलती है ।

कहां गये बारुद से लदे ट्रक ?

देश में हथियार बारुद और सेना के उपकरण कितने महफूज है और इनकी निगरानी किस तरह की जाती है इसकी पोल खोलने के लिये राजस्थान के धौलपुर से मध्यप्रदेश के लिये चले विस्फोटकों से लदे 164 ट्रक का गायब होना ही काफी है । डेढ़ महीने पहले चले इन ट्रकों में पुलिस के मुताबिक कुल 848 मीट्रिक टन विस्फोटक है और लाखों की संख्या में डेटोनेटर । पहले तो इनकी संख्या को लेकर ही सही आंकड़ा नहीं लगाया जा सका और यह संख्या 61 बतायी गयी लेकिन अब तफतीश करने पर यह पता चल रहा है कि गायब ट्रकों की यह संख्या 164 है । पुलिस खोज- बीन के बाद भी कोई सुराग नहीं लगा सकी है । 164 ट्रकों का विस्फोटकों के साथ गायब हो जाना यह बताता है कि हमारा सुरक्षा तंत्र किस तरह हमारी हिफाजत कर सकता है । हमारा खुफिया तंत्र कितना चौकस है और हम कितने महफूज । छोटे पैमाने पर विस्फोटकों की खेप बरामद होने पर पुलिस वाहवाही लूटने पहुंच जाती है, मीडिया को बुलाकर फोटो खिचवाई जाती है और पूरा पुलिस महकमा पुरस्कार देने और लेने की दौड़ में शामिल हो जाता है । लेकिन इतने बड़े पैमाने पर लापरवाही के बाद भी किसी विभाग को कोई ख़बर न हो यह कैसे हो सकता है । सैकड़ों मीट्रिक टन विस्फोटक और लाखों की संख्या में डेटोनेटरों का लापता होना न केवल पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते है बल्कि देश की सुरक्षा के लिये बड़ा खतरा भी बन सकते है । गृहमंत्रालय की निगरानी में बाकायदा लाइसेंसिग प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही ऐसे सौदों को रवाना किया जाता है तथा पूरी तरह सावधानी और गोपनीयता भी बरकार रखी जाती है ऐसे में यह वाकया अपने आप में सुरक्षा तंत्र और षणयंत्रकारी तत्वों की मिली भगत की ओर ही इशारा करता है । ट्रक नंबरों और ट्रक मालिकों से भी कोई जानकारी अभी नहीं मिल सकी है । मई जून महीने में 61 ट्रक रवाना किये गये और इसके बाद 103 ट्रक की रवानगी की गयी, कुल मिलाकर 164 ट्रकों का न मिलना यह भी सवाल उठाते है कि एक महीने तक यह संख्या ही तय नहीं हो पा रही थी कि आखिर में गायब संख्या कितनी है । यानी इस पूरे विस्फोटकों के ट्रांस्पोर्टेशन में किसी माफिया का ही हाथ है । यह भी हो सकता है कि ये हथियार आतंकवादियों या नक्सलियों के हाथ लग गये हो जो एक बड़ा खतरा हो सकता है । सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में भी दो महीने बाद भी विस्फोटकों से लदे 164 ट्रकों का न मिलना हमारे देश की चौकस सुरक्षा इंतजामों के पोल ही खोलता है । ( अमर भारती दैनिक संपादकीय 28 अगस्त 2010)

"नकलची न्यायमूर्ति"


हैदराबाद हाई कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के पांच जजों को निलंबित कर दिया है । जजों को यह सजा नकल करने के जुर्म में दी गयी है । वारंगल जिले के पांच जजों को कानून की स्नातकोत्तर परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़ा गया । कुल आठ नकलची पकड़े गये थे जिनमें वारंगल के सीनियर जिला जज हनुमंतराव, बापतला के सीनियर सिविल जज निवास चारी ,रंगारेड्डी ज़िले के सेकेंड सिविल जज विज्येंद्र रेड्डी,सीनियर सिविल जज अजीत सिंह राव और अनंतपुर के सिविल जज एम कृष्णप्पा शामिल है बाकी 3 कोर्ट के ही कर्मचारी है जिन्हें परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़ा गया । यह परीक्षा वारंगल ज़िलें में काकातियां विश्वविद्यालय के ऑर्टस कालेज में चल रही थी। देश के इतिहास में यह पहला मौका है जब जजों को रंगे हाथ पकड़ा गया हो। हमारे देश में नौकरशाही और नेतानगरी तो भ्रष्टचार में डूबी ही है न्यायपालिका पर भी आरोप लगते रहे है कि जज बिकते है और न्याय खरीदा जाता है । पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन ने भी इस बात को माना था कि न्यायपालिका में अब भ्रष्टाचार की बू आने लगी है लेकिन उन्होंने यह कहा था कि यह जिला अदालतों में ही अधिक है । लेकिन यहां तो वरिष्ठ जज ही नकल कर रहे है तो फिर न्याय के मामले में वो कहा तक पारदर्शिता बरतते होंगे। जब जज ही जुर्म कर रहे है तो फिर न्यायपालिका और न्यायाधीशों पर विश्वास कैसे किया जा सकता है । लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा आज भ्रष्टाचार के किस दलदल में डूबा है यह बताने के लिये यह वाक्या काफी है । जब जज नकल कर रहे है तो फिर समाज और देश के सामने ऐसे न्यायधीश क्या आदर्श प्रस्तुत कर पायेंगे। जजों का यह रवैया उनकी योग्यता और पद पर भी सवाल खड़ा करता है । जो खुद ही नकल करते पकड़े जा रहे है वो अहम मुक्दमों में कैसे फैसले लेते होंगे। यह गिरते न्यायाधीशों के चरित्र का नमूना है। कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी दिनाकरण के उपर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे यहां तक की उनको महाभियोग की कार्रवाई का समना भी करना पड़ा लेकिन बाद में मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट एच.एस कपाड़िया ने राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल से परामर्श कर दिनाकरण को सिक्किम हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया । ऐसे कई नाम है जो न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग है जो न्यायपालिका को बदनाम करते रहे है । सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आर.के. आनंद को संजीव नंदा केस में पैसा लेते हुये स्टिंग ऑपरेशन भी हुआ आनंद दोषी भी पायेगये । लेकिन क्या न्याय के बिक्रेताओं पर लगाम लगी। हमेशा स्थानीय अदलतों में ही भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता है जब की इसकी जड़े गहरी है और जो नकल और अकल का हर काम करते है हमारी न्यायपालिका के गिरते स्तर का यह एक छोटा उदाहरण है हक़ीक़त इससे भी भयावह है । (अमर भारती दैनिक में 28 अगस्त 2010 को प्रकाशित )

Thursday, August 5, 2010

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार की घातक मांग।

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार की घातक मांग।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष केजी बाला कृष्णन के फांसी की सज़ा पर व्यक्तिगत टिपप्ड़ी से अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार महकमें में खलबली मचीं है । के.जी बालाकृष्णन ने डेथ पेनाल्टी को वर्तमान परिद्रश्य के मुताबिक सही ठहराया था और यह भी कहा था कि अपराध रोकने में फांसी की सजा का योगदान है । ह्युमन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) के संस्थापक ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के इस वक्तव्य पर खेद प्रकट करते हुए कहा है कि जब दुनियां भर में मानवाधिकार की मुहिम का एक मुख्य मुद्दा डेथ पेनाल्टी को ख़त्म करना है। ऐसे में भारतीय मानवाधिकार आयोग के मुखिया का यह कथन हैरान कर देने वाला है । मानवाधिकार आयोग और मानवाधिकार की खुले दिल से पैरवी करने वाले सदष्यों को यह सोचना होगा कि अभी तक के इतिहास में कितने लोगों को फांसी की सज़ा से समाज को ख़मियाजा उठाना पड़ा है । मानवाधिकार मानव के अधिकारों की रक्षा करता है लेकिन जहां समाज के लिये ख़तरे की आशंका हो यानी कई मानव के अधिकारों पर चोट पहुंचाने की साजिश हो वहां पर अपराधी को फांसी क्यों नहीं दी जा सकती । मानवाधिकार संगठनों को यह नहीं भूलना चाहिये कि भारत में फांसी दिये जाने की दर बहुत कम है इसका भारत ख़ामियाजा भी भुगतना पड़ा है । अगर आतंकवादियों को फांसी दे दी गयी होती तो 1999 में कांधार विमान अपहरण और 20 साल पहले मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद के अपहरण की दास्तान न रची गयी होती और जिसके बदले आतंकवादियो की रिहाई न होती । कांधार विमान अपहरण कांड में रुपेन कत्याल समेत आधा दर्जन निर्दोष लोगों की हत्याये आतंकवादियों ने की थी, इसके बाद भारतीय ज़ेलों में बंद आतंकी सरगनाओं को छोड़ने पर भारत को मजबूर होना पड़ा । क्या मानवाधिकर आयोग इन सब घटनाओं पर गौर करेगा ।जिसका ख़ामियाजा भारत आज भी उठा रहा है । फांसी का अपना खौफ़ आज भी है । जिसे नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता । मानवाधिकार की दलील है कि डेथ पेनाल्टी को आजीवन कारावास में बदला जाये लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि आजीवन कारावास की सजा काटने के बाद अपराधी में सुधार आयेगा ही और अपराधी अपराध की दुनियां में तेजी से पदार्पण नहीं करेगा, समाज में वापसी के बाद वह अपराध नहीं करेगा और समाज के लिये ख़तरा नहीं होगा । कई ऐसे अपराधी है जो जमानत पर बाहर आते ही आतंक का नया रुप ले लेते है और पुलिस की पकड़ से बाहर हो जाते है । क्या इसका कोई कारगर उपाय मानवाधिकार आयोग के पास है । हमारी न्यायिक प्रक्रिया काफी धीमी है कई मामलों में आरोप सिद्ध होने और दोष साबित होने में इतना वक्त लग जाता है कि दोषी अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा जेल में पहले ही काट चुका होता है । ऐसे में अगर दोषी को हर मामले में आजीवन कारावास की सज़ा देने का नियम बन जायेगा तो कई दोषी सजा मिलने के तुरंत बाद ही जेल की सलाखों के बाहर होगें और समाज में अपराध की दुनिया बनायेंगे। क्या कभी मानवाधिकार की दलील देने वालों ने इसकी फिक्र की । तब यह भी होगा कि अपराधी अपराध करने से पहले ही अपनी आजीवन कारावास के बाद की ज़िंदगी का पूरा खाका तैयार कर लेगा और धड़ल्ले से अपराध करेगा, इससे अपराध की बाढ़ आ जायेगी और देश के सामने संकट पैदा होगा । अभी हमारे देश में कई ऐसे अपराधी ज़ेलों में बंद हैं जिनकी फांसी होनी है लेकिन फाईल प्रदेश सरकार से लेकर महामहिम राष्ट्रपति के पास ही अटकी है । आमिर अजमल कसाब और अफ़जल गुरु देश के लिये कितने ख़तरनाक है इसकी परवाह मानवाधिकार अयोग को शायद नहीं है । अगर होती तो ऐसी मांग न उठती ।
मानवाधिकार के पैरोकारों को देश समाज और आम आदमी को सुरक्षित रखने के लिये डेथ पेनाल्टी को खत्म करने की मांग नहीं बल्कि प्रक्रिया को तेज करने की मांग करनी चाहिये नहीं तो एक और कांधार और मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद की कहानी को दोहराते देर नहीं लगेगा । मानवाधिकार उनकी रक्षा के लिये होते है जो मानवता के अर्थ को समझते हो न कि उनके लिये जो मानवता को नष्ट करना चाहते है । मानवाधिकार आयोग और न्यायपालिका को मिलकर समाज को अपराध मुक्त बनाना है न कि अपराध को जिंदा रख कर कई अपराध पैदा करने की। राष्ट्रीय मानवाधिकार के अध्यक्ष के.जी बालाकृष्णन के कथन पर बखेड़ा खड़ा करने की जरुरत नहीं अक्षरसः पालन करने की जरुरत है । हमे नहीं भूलना चाहिये कि हमारा क़ानून अभी भी दुर्लभत्म मामलों में ही फांसी की सज़ा देता है । ऐसे में फांसी की सज़ा ख़त्म होने से हर हाल में अपराध बढ़ेगा ही ।

अखिलेश पाठक
पत्रकार
अमर भारती (दैनिक हिंदी समाचार पत्र में प्रकाशित)
दिल्ली
Mail. ID. akhileshnews@gmail.com

Friday, July 30, 2010

मुहावरे और लोकोक्तियाँ

अखिलेश पाठक के चुने हुए लोकोक्ति और मुहावरें

मुहावरे और लोकोक्तियाँ

मुहावरा- कोई भी ऐसा वाक्यांश जो अपने साधारण अर्थ को छोड़कर किसी विशेष अर्थ को व्यक्त करे उसे मुहावरा कहते हैं।
लोकोक्ति- लोकोक्तियाँ लोक-अनुभव से बनती हैं। किसी समाज ने जो कुछ अपने लंबे अनुभव से सीखा है उसे एक वाक्य में बाँध दिया है। ऐसे वाक्यों को ही लोकोक्ति कहते हैं। इसे कहावत, जनश्रुति आदि भी कहते हैं।
मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर- मुहावरा वाक्यांश है और इसका स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं किया जा सकता। लोकोक्ति संपूर्ण वाक्य है और इसका प्रयोग स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है। जैसे-‘होश उड़ जाना’ मुहावरा है। ‘बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी’ लोकोक्ति है।
कुछ प्रचलित मुहावरे
1. अंग संबंधी मुहावरे

1. अंग छूटा- (कसम खाना) मैं अंग छूकर कहता हूँ साहब, मैने पाजेब नहीं देखी।
2. अंग-अंग मुसकाना-(बहुत प्रसन्न होना)- आज उसका अंग-अंग मुसकरा रहा था।
3. अंग-अंग टूटना-(सारे बदन में दर्द होना)-इस ज्वर ने तो मेरा अंग-अंग तोड़कर रख दिया।
4. अंग-अंग ढीला होना-(बहुत थक जाना)- तुम्हारे साथ कल चलूँगा। आज तो मेरा अंग-अंग ढीला हो रहा है।
2. अक्ल-संबंधी मुहावरे

1. अक्ल का दुश्मन-(मूर्ख)- वह तो निरा अक्ल का दुश्मन निकला।
2. अक्ल चकराना-(कुछ समझ में न आना)-प्रश्न-पत्र देखते ही मेरी अक्ल चकरा गई।
3. अक्ल के पीछे लठ लिए फिरना (समझाने पर भी न मानना)- तुम तो सदैव अक्ल के पीछे लठ लिए फिरते हो।
4. अक्ल के घोड़े दौड़ाना-(तरह-तरह के विचार करना)- बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने अक्ल के घोड़े दौड़ाए, तब कहीं वे अणुबम बना सके।
3. आँख-संबंधी मुहावरे

1. आँख दिखाना-(गुस्से से देखना)- जो हमें आँख दिखाएगा, हम उसकी आँखें फोड़ देगें।
2. आँखों में गिरना-(सम्मानरहित होना)- कुरसी की होड़ ने जनता सरकार को जनता की आँखों में गिरा दिया।
3. आँखों में धूल झोंकना-(धोखा देना)- शिवाजी मुगल पहरेदारों की आँखों में धूल झोंककर बंदीगृह से बाहर निकल गए।
4. आँख चुराना-(छिपना)- आजकल वह मुझसे आँखें चुराता फिरता है।
5. आँख मारना-(इशारा करना)-गवाह मेरे भाई का मित्र निकला, उसने उसे आँख मारी, अन्यथा वह मेरे विरुद्ध गवाही दे देता।
6. आँख तरसना-(देखने के लालायित होना)- तुम्हें देखने के लिए तो मेरी आँखें तरस गई।
7. आँख फेर लेना-(प्रतिकूल होना)- उसने आजकल मेरी ओर से आँखें फेर ली हैं।
8. आँख बिछाना-(प्रतीक्षा करना)- लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिधर जाते थे उधर ही जनता उनके लिए आँखें बिछाए खड़ी होती थी।
9. आँखें सेंकना-(सुंदर वस्तु को देखते रहना)- आँख सेंकते रहोगे या कुछ करोगे भी
10. आँखें चार होना-(प्रेम होना,आमना-सामना होना)- आँखें चार होते ही वह खिड़की पर से हट गई।
11. आँखों का तारा-(अतिप्रिय)-आशीष अपनी माँ की आँखों का तारा है।
12. आँख उठाना-(देखने का साहस करना)- अब वह कभी भी मेरे सामने आँख नहीं उठा सकेगा।
13. आँख खुलना-(होश आना)- जब संबंधियों ने उसकी सारी संपत्ति हड़प ली तब उसकी आँखें खुलीं।
14. आँख लगना-(नींद आना अथवा व्यार होना)- बड़ी मुश्किल से अब उसकी आँख लगी है। आजकल आँख लगते देर नहीं होती।
15. आँखों पर परदा पड़ना-(लोभ के कारण सचाई न दीखना)- जो दूसरों को ठगा करते हैं, उनकी आँखों पर परदा पड़ा हुआ है। इसका फल उन्हें अवश्य मिलेगा।
16. आँखों का काटा-(अप्रिय व्यक्ति)- अपनी कुप्रवृत्तियों के कारण राजन पिताजी की आँखों का काँटा बन गया।
17. आँखों में समाना-(दिल में बस जाना)- गिरधर मीरा की आँखों में समा गया।
4. कलेजा-संबंधी कुछ मुहावरे

1. कलेजे पर हाथ रखना-(अपने दिल से पूछना)- अपने कलेजे पर हाथ रखकर कहो कि क्या तुमने पैन नहीं तोड़ा।
2. कलेजा जलना-(तीव्र असंतोष होना)- उसकी बातें सुनकर मेरा कलेजा जल उठा।
3. कलेजा ठंडा होना-(संतोष हो जाना)- डाकुओं को पकड़ा हुआ देखकर गाँव वालों का कलेजा ठंढा हो गया।
4. कलेजा थामना-(जी कड़ा करना)- अपने एकमात्र युवा पुत्र की मृत्यु पर माता-पिता कलेजा थामकर रह गए।
5. कलेजे पर पत्थर रखना-(दुख में भी धीरज रखना)- उस बेचारे की क्या कहते हों, उसने तो कलेजे पर पत्थर रख लिया है।
6. कलेजे पर साँप लोटना-(ईर्ष्या से जलना)- श्रीराम के राज्याभिषेक का समाचार सुनकर दासी मंथरा के कलेजे पर साँप लोटने लगा।
5. कान-संबंधी कुछ मुहावरे

1. कान भरना-(चुगली करना)- अपने साथियों के विरुद्ध अध्यापक के कान भरने वाले विद्यार्थी अच्छे नहीं होते।
2. कान कतरना-(बहुत चतुर होना)- वह तो अभी से बड़े-बड़ों के कान कतरता है।
3. कान का कच्चा-(सुनते ही किसी बात पर विश्वास करना)- जो मालिक कान के कच्चे होते हैं वे भले कर्मचारियों पर भी विश्वास नहीं करते।
4. कान पर जूँ तक न रेंगना-(कुछ असर न होना)-माँ ने गौरव को बहुत समझाया, किन्तु उसके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी।
5. कानोंकान खबर न होना-(बिलकुल पता न चलना)-सोने के ये बिस्कुट ले जाओ, किसी को कानोंकान खबर न हो।
6. नाक-संबंधी कुछ मुहावरे

1. नाक में दम करना-(बहुत तंग करना)- आतंकवादियों ने सरकार की नाक में दम कर रखा है।
2. नाक रखना-(मान रखना)- सच पूछो तो उसने सच कहकर मेरी नाक रख ली।
3. नाक रगड़ना-(दीनता दिखाना)-गिरहकट ने सिपाही के सामने खूब नाक रगड़ी, पर उसने उसे छोड़ा नहीं।
4. नाक पर मक्खी न बैठने देना-(अपने पर आँच न आने देना)-कितनी ही मुसीबतें उठाई, पर उसने नाक पर मक्खी न बैठने दी।
5. नाक कटना-(प्रतिष्ठा नष्ट होना)- अरे भैया आजकल की औलाद तो खानदान की नाक काटकर रख देती है।
7. मुँह-संबंधी कुछ मुहावरे

1. मुँह की खाना-(हार मानना)-पड़ोसी के घर के मामले में दखल देकर हरद्वारी को मुँह की खानी पड़ी।
2. मुँह में पानी भर आना-(दिल ललचाना)- लड्डुओं का नाम सुनते ही पंडितजी के मुँह में पानी भर आया।
3. मुँह खून लगना-(रिश्वत लेने की आदत पड़ जाना)- उसके मुँह खून लगा है, बिना लिए वह काम नहीं करेगा।
4. मुँह छिपाना-(लज्जित होना)- मुँह छिपाने से काम नहीं बनेगा, कुछ करके भी दिखाओ।
5. मुँह रखना-(मान रखना)-मैं तुम्हारा मुँह रखने के लिए ही प्रमोद के पास गया था, अन्यथा मुझे क्या आवश्यकता थी।
6. मुँहतोड़ जवाब देना-(कड़ा उत्तर देना)- श्याम मुँहतोड़ जवाब सुनकर फिर कुछ नहीं बोला।
7. मुँह पर कालिख पोतना-(कलंक लगाना)-बेटा तुम्हारे कुकर्मों ने मेरे मुँह पर कालिख पोत दी है।
8. मुँह उतरना-(उदास होना)-आज तुम्हारा मुँह क्यों उतरा हुआ है।
9. मुँह ताकना-(दूसरे पर आश्रित होना)-अब गेहूँ के लिए हमें अमेरिका का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा।
10. मुँह बंद करना-(चुप कर देना)-आजकल रिश्वत ने बड़े-बड़े अफसरों का मुँह बंद कर रखा है।
8. दाँत-संबंधी मुहावरे

1. दाँत पीसना-(बहुत ज्यादा गुस्सा करना)- भला मुझ पर दाँत क्यों पीसते हो? शीशा तो शंकर ने तोड़ा है।
2. दाँत खट्टे करना-(बुरी तरह हराना)- भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों के दाँत खट्टे कर दिए।
3. दाँत काटी रोटी-(घनिष्ठता, पक्की मित्रता)- कभी राम और श्याम में दाँत काटी रोटी थी पर आज एक-दूसरे के जानी दुश्मन है।
9. गरदन-संबंधी मुहावरे

1. गरदन झुकाना-(लज्जित होना)- मेरा सामना होते ही उसकी गरदन झुक गई।
2. गरदन पर सवार होना-(पीछे पड़ना)- मेरी गरदन पर सवार होने से तुम्हारा काम नहीं बनने वाला है।
3. गरदन पर छुरी फेरना-(अत्याचार करना)-उस बेचारे की गरदन पर छुरी फेरते तुम्हें शरम नहीं आती, भगवान इसके लिए तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेंगे।
10. गले-संबंधी मुहावरे

1. गला घोंटना-(अत्याचार करना)- जो सरकार गरीबों का गला घोंटती है वह देर तक नहीं टिक सकती।
2. गला फँसाना-(बंधन में पड़ना)- दूसरों के मामले में गला फँसाने से कुछ हाथ नहीं आएगा।
3. गले मढ़ना-(जबरदस्ती किसी को कोई काम सौंपना)- इस बुद्धू को मेरे गले मढ़कर लालाजी ने तो मुझे तंग कर डाला है।
4. गले का हार-(बहुत प्यारा)- तुम तो उसके गले का हार हो, भला वह तुम्हारे काम को क्यों मना करने लगा।
11. सिर-संबंधी मुहावरे

1. सिर पर भूत सवार होना-(धुन लगाना)-तुम्हारे सिर पर तो हर समय भूत सवार रहता है।
2. सिर पर मौत खेलना-(मृत्यु समीप होना)- विभीषण ने रावण को संबोधित करते हुए कहा, ‘भैया ! मुझे क्या डरा रहे हो ? तुम्हारे सिर पर तो मौत खेल रही है‘।
3. सिर पर खून सवार होना-(मरने-मारने को तैयार होना)- अरे, बदमाश की क्या बात करते हो ? उसके सिर पर तो हर समय खून सवार रहता है।
4. सिर-धड़ की बाजी लगाना-(प्राणों की भी परवाह न करना)- भारतीय वीर देश की रक्षा के लिए सिर-धड़ की बाजी लगा देते हैं।
5. सिर नीचा करना-(लजा जाना)-मुझे देखते ही उसने सिर नीचा कर लिया।
12. हाथ-संबंधी मुहावरे

1. हाथ खाली होना-(रुपया-पैसा न होना)- जुआ खेलने के कारण राजा नल का हाथ खाली हो गया था।
2. हाथ खींचना-(साथ न देना)-मुसीबत के समय नकली मित्र हाथ खींच लेते हैं।
3. हाथ पे हाथ धरकर बैठना-(निकम्मा होना)- उद्यमी कभी भी हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठते हैं, वे तो कुछ करके ही दिखाते हैं।
4. हाथों के तोते उड़ना-(दुख से हैरान होना)- भाई के निधन का समाचार पाते ही उसके हाथों के तोते उड़ गए।
5. हाथोंहाथ-(बहुत जल्दी)-यह काम हाथोंहाथ हो जाना चाहिए।
6. हाथ मलते रह जाना-(पछताना)- जो बिना सोचे-समझे काम शुरू करते है वे अंत में हाथ मलते रह जाते हैं।
7. हाथ साफ करना-(चुरा लेना)- ओह ! किसी ने मेरी जेब पर हाथ साफ कर दिया।
8. हाथ-पाँव मारना-(प्रयास करना)- हाथ-पाँव मारने वाला व्यक्ति अंत में अवश्य सफलता प्राप्त करता है।
9. हाथ डालना-(शुरू करना)- किसी भी काम में हाथ डालने से पूर्व उसके अच्छे या बुरे फल पर विचार कर लेना चाहिए।
13. हवा-संबंधी मुहावरे

1. हवा लगना-(असर पड़ना)-आजकल भारतीयों को भी पश्चिम की हवा लग चुकी है।
2. हवा से बातें करना-(बहुत तेज दौड़ना)- राणा प्रताप ने ज्यों ही लगाम हिलाई, चेतक हवा से बातें करने लगा।
3. हवाई किले बनाना-(झूठी कल्पनाएँ करना)- हवाई किले ही बनाते रहोगे या कुछ करोगे भी ?
4. हवा हो जाना-(गायब हो जाना)- देखते-ही-देखते मेरी साइकिल न जाने कहाँ हवा हो गई ?
14. पानी-संबंधी मुहावरे

1. पानी-पानी होना-(लज्जित होना)-ज्योंही सोहन ने माताजी के पर्स में हाथ डाला कि ऊपर से माताजी आ गई। बस, उन्हें देखते ही वह पानी-पानी हो गया।
2. पानी में आग लगाना-(शांति भंग कर देना)-तुमने तो सदा पानी में आग लगाने का ही काम किया है।
3. पानी फेर देना-(निराश कर देना)-उसने तो मेरी आशाओं पर पानी पेर दिया।
4. पानी भरना-(तुच्छ लगना)-तुमने तो जीवन-भर पानी ही भरा है।
15. कुछ मिले-जुले मुहावरे

1. अँगूठा दिखाना-(देने से साफ इनकार कर देना)-सेठ रामलाल ने धर्मशाला के लिए पाँच हजार रुपए दान देने को कहा था, किन्तु जब मैनेजर उनसे मांगने गया तो उन्होंने अँगूठा दिखा दिया।
2. अगर-मगर करना-(टालमटोल करना)-अगर-मगर करने से अब काम चलने वाला नहीं है। बंधु !
3. अंगारे बरसाना-(अत्यंत गुस्से से देखना)-अभिमन्यु वध की सूचना पाते ही अर्जुन के नेत्र अंगारे बरसाने लगे।
4. आड़े हाथों लेना-(अच्छी तरह काबू करना)-श्रीकृष्ण ने कंस को आड़े हाथों लिया।
5. आकाश से बातें करना-(बहुत ऊँचा होना)-टी.वी.टावर तो आकाश से बाते करती है।
6. ईद का चाँद-(बहुत कम दीखना)-मित्र आजकल तो तुम ईद का चाँद हो गए हो, कहाँ रहते हो ?
7. उँगली पर नचाना-(वश में करना)-आजकल की औरतें अपने पतियों को उँगलियों पर नचाती हैं।
8. कलई खुलना-(रहस्य प्रकट हो जाना)-उसने तो तुम्हारी कलई खोलकर रख दी।
9. काम तमाम करना-(मार देना)- रानी लक्ष्मीबाई ने पीछा करने वाले दोनों अंग्रेजों का काम तमाम कर दिया।
10. कुत्ते की मौत करना-(बुरी तरह से मरना)-राष्ट्रद्रोही सदा कुत्ते की मौत मरते हैं।
11. कोल्हू का बैल-(निरंतर काम में लगे रहना)-कोल्हू का बैल बनकर भी लोग आज भरपेट भोजन नहीं पा सकते।
12. खाक छानना-(दर-दर भटकना)-खाक छानने से तो अच्छा है एक जगह जमकर काम करो।
13. गड़े मुरदे उखाड़ना-(पिछली बातों को याद करना)-गड़े मुरदे उखाड़ने से तो अच्छा है कि अब हम चुप हो जाएँ।
14. गुलछर्रे उड़ाना-(मौज करना)-आजकल तुम तो दूसरे के माल पर गुलछर्रे उड़ा रहे हो।
15. घास खोदना-(फुजूल समय बिताना)-सारी उम्र तुमने घास ही खोदी है।
16. चंपत होना-(भाग जाना)-चोर पुलिस को देखते ही चंपत हो गए।
17. चौकड़ी भरना-(छलाँगे लगाना)-हिरन चौकड़ी भरते हुए कहीं से कहीं जा पहुँचे।
18. छक्के छुडा़ना-(बुरी तरह पराजित करना)-पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गोरी के छक्के छुड़ा दिए।
19. टका-सा जवाब देना-(कोरा उत्तर देना)-आशा थी कि कहीं वह मेरी जीविका का प्रबंध कर देगा, पर उसने तो देखते ही टका-सा जवाब दे दिया।
20. टोपी उछालना-(अपमानित करना)-मेरी टोपी उछालने से उसे क्या मिलेगा?
21. तलवे चाटने-(खुशामद करना)-तलवे चाटकर नौकरी करने से तो कहीं डूब मरना अच्छा है।
22. थाली का बैंगन-(अस्थिर विचार वाला)- जो लोग थाली के बैगन होते हैं, वे किसी के सच्चे मित्र नहीं होते।
23. दाने-दाने को तरसना-(अत्यंत गरीब होना)-बचपन में मैं दाने-दाने को तरसता फिरा, आज ईश्वर की कृपा है।
24. दौड़-धूप करना-(कठोर श्रम करना)-आज के युग में दौड़-धूप करने से ही कुछ काम बन पाता है।
25. धज्जियाँ उड़ाना-(नष्ट-भ्रष्ट करना)-यदि कोई भी राष्ट्र हमारी स्वतंत्रता को हड़पना चाहेगा तो हम उसकी धज्जियाँ उड़ा देंगे।
26. नमक-मिर्च लगाना-(बढ़ा-चढ़ाकर कहना)-आजकल समाचारपत्र किसी भी बात को इस प्रकार नमक-मिर्च लगाकर लिखते हैं कि जनसाधारण उस पर विश्वास करने लग जाता है।
27. नौ-दो ग्यारह होना-(भाग जाना)- बिल्ली को देखते ही चूहे नौ-दो ग्यारह हो गए। 28. फूँक-फूँककर कदम रखना-(सोच-समझकर कदम बढ़ाना)-जवानी में फूँक-फूँककर कदम रखना चाहिए।
29. बाल-बाल बचना-(बड़ी कठिनाई से बचना)-गाड़ी की टक्कर होने पर मेरा मित्र बाल-बाल बच गया।
30. भाड़ झोंकना-(योंही समय बिताना)-दिल्ली में आकर भी तुमने तीस साल तक भाड़ ही झोंका है।
31. मक्खियाँ मारना-(निकम्मे रहकर समय बिताना)-यह समय मक्खियाँ मारने का नहीं है, घर का कुछ काम-काज ही कर लो।
32. माथा ठनकना-(संदेह होना)- सिंह के पंजों के निशान रेत पर देखते ही गीदड़ का माथा ठनक गया।
33. मिट्टी खराब करना-(बुरा हाल करना)-आजकल के नौजवानों ने बूढ़ों की मिट्टी खराब कर रखी है।
34. रंग उड़ाना-(घबरा जाना)-काले नाग को देखते ही मेरा रंग उड़ गया।
35. रफूचक्कर होना-(भाग जाना)-पुलिस को देखते ही बदमाश रफूचक्कर हो गए।
36. लोहे के चने चबाना-(बहुत कठिनाई से सामना करना)- मुगल सम्राट अकबर को राणाप्रताप के साथ टक्कर लेते समय लोहे के चने चबाने पड़े।
37. विष उगलना-(बुरा-भला कहना)-दुर्योधन को गांडीव धनुष का अपमान करते देख अर्जुन विष उगलने लगा।
38. श्रीगणेश करना-(शुरू करना)-आज बृहस्पतिवार है, नए वर्ष की पढाई का श्रीगणेश कर लो।
39. हजामत बनाना-(ठगना)-ये हिप्पी न जाने कितने भारतीयों की हजामत बना चुके हैं।
40. शैतान के कान कतरना-(बहुत चालाक होना)-तुम तो शैतान के भी कान कतरने वाले हो, बेचारे रामनाथ की तुम्हारे सामने बिसात ही क्या है ?
41. राई का पहाड़ बनाना-(छोटी-सी बात को बहुत बढ़ा देना)- तनिक-सी बात के लिए तुमने राई का पहाड़ बना दिया।
कुछ प्रचलित लोकोक्तियाँ

1. अधजल गगरी छलकत जाए-(कम गुण वाला व्यक्ति दिखावा बहुत करता है)- श्याम बातें तो ऐसी करता है जैसे हर विषय में मास्टर हो, वास्तव में उसे किसी विषय का भी पूरा ज्ञान नहीं-अधजल गगरी छलकत जाए।
2. अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गई खेत-(समय निकल जाने पर पछताने से क्या लाभ)- सारा साल तुमने पुस्तकें खोलकर नहीं देखीं। अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।
3. आम के आम गुठलियों के दाम-(दुगुना लाभ)- हिन्दी पढ़ने से एक तो आप नई भाषा सीखकर नौकरी पर पदोन्नति कर सकते हैं, दूसरे हिन्दी के उच्च साहित्य का रसास्वादन कर सकते हैं, इसे कहते हैं-आम के आम गुठलियों के दाम।
4. ऊँची दुकान फीका पकवान-(केवल ऊपरी दिखावा करना)- कनॉटप्लेस के अनेक स्टोर बड़े प्रसिद्ध है, पर सब घटिया दर्जे का माल बेचते हैं। सच है, ऊँची दुकान फीका पकवान।
5. घर का भेदी लंका ढाए-(आपसी फूट के कारण भेद खोलना)-कई व्यक्ति पहले कांग्रेस में थे, अब जनता (एस) पार्टी में मिलकर काग्रेंस की बुराई करते हैं। सच है, घर का भेदी लंका ढाए।
6. जिसकी लाठी उसकी भैंस-(शक्तिशाली की विजय होती है)- अंग्रेजों ने सेना के बल पर बंगाल पर अधिकार कर लिया था-जिसकी लाठी उसकी भैंस।
7. जल में रहकर मगर से वैर-(किसी के आश्रय में रहकर उससे शत्रुता मोल लेना)- जो भारत में रहकर विदेशों का गुणगान करते हैं, उनके लिए वही कहावत है कि जल में रहकर मगर से वैर।
8. थोथा चना बाजे घना-(जिसमें सत नहीं होता वह दिखावा करता है)- गजेंद्र ने अभी दसवीं की परीक्षा पास की है, और आलोचना अपने बड़े-बड़े गुरुजनों की करता है। थोथा चना बाजे घना।
9. दूध का दूध पानी का पानी-(सच और झूठ का ठीक फैसला)- सरपंच ने दूध का दूध,पानी का पानी कर दिखाया, असली दोषी मंगू को ही दंड मिला।
10. दूर के ढोल सुहावने-(जो चीजें दूर से अच्छी लगती हों)- उनके मसूरी वाले बंगले की बहुत प्रशंसा सुनते थे किन्तु वहाँ दुर्गंध के मारे तंग आकर हमारे मुख से निकल ही गया-दूर के ढोल सुहावने।
11. न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी-(कारण के नष्ट होने पर कार्य न होना)- सारा दिन लड़के आमों के लिए पत्थर मारते रहते थे। हमने आँगन में से आम का वृक्ष की कटवा दिया। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।
12. नाच न जाने आँगन टेढ़ा-(काम करना नहीं आना और बहाने बनाना)-जब रवींद्र ने कहा कि कोई गीत सुनाइए, तो सुनील बोला, ‘आज समय नहीं है’। फिर किसी दिन कहा तो कहने लगा, ‘आज मूड नहीं है’। सच है, नाच न जाने आँगन टेढ़ा।
13. बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख-(माँगे बिना अच्छी वस्तु की प्राप्ति हो जाती है, माँगने पर साधारण भी नहीं मिलती)- अध्यापकों ने माँगों के लिए हड़ताल कर दी, पर उन्हें क्या मिला ? इनसे तो बैक कर्मचारी अच्छे रहे, उनका भत्ता बढ़ा दिया गया। बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख।
14. मान न मान मैं तेरा मेहमान-(जबरदस्ती किसी का मेहमान बनना)-एक अमेरिकन कहने लगा, मैं एक मास आपके पास रहकर आपके रहन-सहन का अध्ययन करूँगा। मैंने मन में कहा, अजब आदमी है, मान न मान मैं तेरा मेहमान।
15. मन चंगा तो कठौती में गंगा-(यदि मन पवित्र है तो घर ही तीर्थ है)-भैया रामेश्वरम जाकर क्या करोगे ? घर पर ही ईशस्तुति करो। मन चंगा तो कठौती में गंगा।
16. दोनों हाथों में लड्डू-(दोनों ओर लाभ)- महेंद्र को इधर उच्च पद मिल रहा था और उधर अमेरिका से वजीफा उसके तो दोनों हाथों में लड्डू थे।
17. नया नौ दिन पुराना सौ दिन-(नई वस्तुओं का विश्वास नहीं होता, पुरानी वस्तु टिकाऊ होती है)- अब भारतीय जनता का यह विश्वास है कि इस सरकार से तो पहली सरकार फिर भी अच्छी थी। नया नौ दिन, पुराना नौ दिन।
18. बगल में छुरी मुँह में राम-राम-(भीतर से शत्रुता और ऊपर से मीठी बातें)- साम्राज्यवादी आज भी कुछ राष्ट्रों को उन्नति की आशा दिलाकर उन्हें अपने अधीन रखना चाहते हैं, परन्तु अब सभी देश समझ गए हैं कि उनकी बगल में छुरी और मुँह में राम-राम है।
19. लातों के भूत बातों से नहीं मानते-(शरारती समझाने से वश में नहीं आते)- सलीम बड़ा शरारती है, पर उसके अब्बा उसे प्यार से समझाना चाहते हैं। किन्तु वे नहीं जानते कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
20. सहज पके जो मीठा होय-(धीरे-धीरे किए जाने वाला कार्य स्थायी फलदायक होता है)- विनोबा भावे का विचार था कि भूमि सुधार धीरे-धीरे और शांतिपूर्वक लाना चाहिए क्योंकि सहज पके सो मीठा होय।
21. साँप मरे लाठी न टूटे-(हानि भी न हो और काम भी बन जाए)- घनश्याम को उसकी दुष्टता का ऐसा मजा चखाओ कि बदनामी भी न हो और उसे दंड भी मिल जाए। बस यही समझो कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
22. अंत भला सो भला-(जिसका परिणाम अच्छा है, वह सर्वोत्तम है)- श्याम पढ़ने में कमजोर था, लेकिन परीक्षा का समय आते-आते पूरी तैयारी कर ली और परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी को कहते हैं अंत भला सो भला।
23. चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए-(बहुत कंजूस होना)-महेंद्रपाल अपने बेटे को अच्छे कपड़े तक भी सिलवाकर नहीं देता। उसका तो यही सिद्धान्त है कि चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।
24. सौ सुनार की एक लुहार की-(निर्बल की सैकड़ों चोटों की सबल एक ही चोट से मुकाबला कर देते है)- कौरवों ने भीम को बहुत तंग किया तो वह कौरवों को गदा से पीटने लगा-सौ सुनार की एक लुहार की।
25. सावन हरे न भादों सूखे-(सदैव एक-सी स्थिति में रहना)- गत चार वर्षों में हमारे वेतन व भत्ते में एक सौ रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है। उधर 25 प्रतिशत दाम बढ़ गए हैं-भैया हमारी तो यही स्थिति रही है कि सावन हरे न भागों सूखे।

Tuesday, July 20, 2010

ख़तरनाक ऑक्टोपस

पॉल ऑक्टोपस की भविष्यवाणियां फीफा फुटबाल विश्वकप में भले ही रोमांच पैदा कर रही थी लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके पहले यह दुनिया अंधविश्वासों का शिकार नहीं रही है । बालीबुड में इन्हीं टोटकों का राज चलता है । मुम्बई के कई फिल्म प्रोडयूसर एक विशेष अक्षर से शुरु होने वाले नामों से ही फिल्म का नाम रखते है तो फिल्म की रिलीज भी किसी खास दिन और तारीख को ध्यान में रखकर ही होती है।

फीफा विश्वकप में पॉलऑक्टोपस ने 7 भविष्यवाणियां की थी संयोग कहें या चमत्कार पॉल की हर बात सच साबित होती रही और आठ पैरों वाला ऑक्टोपस ज्योतिषी बन बैठा । हर तरफ ऑक्टोपस बाबा की जय होने लगी । भविष्यवाणी करने वाला पुराना पंडित फेल हो गया । तोते की बात ग़लत साबित हुयी । हालैंड हार गया । लेकिन हार जीत से अलग अब आगे होने वाले मुकाबलों में, हर मैच में चाहे वह फुटवाल हो या क्रिकेट हो या हॉकी ऐसी भविष्यवाणिया होंगी और पहले से भी ज्यादा इन पर लोग विश्वास करेंगे । ऑक्टोपस ने सट्टा बाजारों में जो रोमांच पैदा किया उसने तो फीफा विश्वकप जीतने वाले स्पेन की ईनामी राशि को भी पीछे छोड़ दिया । क्रिकेट मैचों पर आज भी सट्टे लगते है। और यह भी माना जाता है कि इन सट्टों की वजह से ही मैच फिक्सिंग की शुरुआत भी हुयी थी । ऐसे में आज रोमांच पैदा कर रहा ऑक्टोपस पॉल आगामी किसी भी खेल के लिये किस हदतक विलेन बन सकता है इसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल होगा । जब मेहनत से खेलने और जीतने के बाद मिली ईनामी राशि से कई गुना ज्यादा पैसा हारने से मिलता है तो फिर हारने से नुक्सान ही क्या है। पॉल ऑक्टोपस आज भले ही खेल का भाग्य न बदल पाये लेकिन सट्टेवाजों और खिलाड़ियों का भाग्य ज़रुर बदल जायेगा। मीडिया चैनलों से लेकर अख़बारी दुनियां ने भी पॉलऑक्टोपस की ख़बरें खूब देखी गयी । स्पेन के लिये पॉल भले ही शुभ साबित हुआ हो लेकिन खेल की दुनिया के लिये यह विलेन बन कर आया है इसकी ख़बर किसी को भले ही न हो लेकिन यह ख़तरनाक शुरुआत है । हमे कर्म से आशा करनी होगी, कर्म बड़ा या ऑक्टोपस यह बहस जरुर हो सकती है लेकिन ऑक्टोपस की हार तय है। हमे अंधविश्वासो से बचना होगा।